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सोनभद्र में खड़िया खदान विस्तार के लोक सुनवाई हेतु पर्चा वितरण पर ग्रामीणों ने उठाया सवाल 


यूपी -सोनभद्र

 

दिनांक -27/10/2026

 

रिपोर्ट -सतीश दुबे -शत्रुघ्न कुमार

 

 

कथित ग्रामीणों के भीतर चर्चाएं नियमों का नहीं हुआ पालन

 

क्यों नियमानुसार 30 दिन पूर्व इस तरह ग्रामीणों को सूचना नहीं दिया गया

कथित 1 दिन पहले बांट रहे पर्चा, 5 गांवों की जमीन और 20 मिलियन टन कोयले पर उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए सवाल

 

खबरों अनुसार चिल्काटाड, खड़िया, परसवार राजा,भैरवा क्षेत्र प्रभावित होगा

 

इस मामले में परसवार राजा के प्रधान ने एनसीएल खड़िया द्वारा किस तरह का पत्र दिया गया उन्होंने देखा ही नहीं ऐसा कहा

 

न्यूज़ प्वाइंट खबर के माध्यम से जनता को जागरूक करना और किसी भी लोक सुनवाई का विरोध नहीं करना है

 

सोनभद्र। सोनभद्र में शक्ति नगर स्थित मेसर्स नार्दर्न कोल फिल्डस लिमिटेड एनसीएल की खड़िया परियोजना के विस्तार के लिए 28 अक्टूबर 2026 को लोक सुनवाई रखी गई है। मंगलवार दोपहर ग्राम पंचायत परसवार राजा मे एक वाहन के माध्यम से पर्चा वितरण कर लाउडस्पीकर से बताया गया कि डीएवी पब्लिक स्कूल ग्राउण्ड एनसीएल खड़िया कॉलोनी, समय दोपहर 12 बजे लोक सुनवाई होनी है जिसकी अध्यक्षता सोनभद्र जिलाधिकारी द्वारा नामित अपर जिलाधिकारी न्यायिक करेंगे। अब ग्रामीणों में चर्चाएं जोर पकड़ने लगी है कि क्यों गांव में इस लोक सुनवाई की सूचना लोगों को सिर्फ एक दिन पहले दी जा रही है। इस लोक सुनवाई से संबंधित पत्र के बारे में परसवार राजा गांव के प्रधान अविनाश कुमार द्वारा हमने उनसे पूछा तो उन्होंने कहा एक लेटर आया था क्या था हम नहीं देखे मांगने पर उन्होंने कहा कहा था दिए हैं मिल नहीं रहा है, अब सवाल यह है कि क्या एक जनप्रतिनिधि का ऐसा रवैया ग्रामीणों में किस तरह का संदेश देता है अगर उन्हें जानकारी नहीं या जानकारी मिली तो उन्होंने ग्रामीणों के इस बारे में किस माध्यम से अवगत कराया या फिर क्यों नहीं अवगत कराया? या फिर उन्होंने एनसीएल खड़िया परियोजना के जिम्मेदार अधिकारियों से इस संबंध में जानकारी क्यों नहीं लिया कि इस तरह कि चर्चाएं चल रही है ग्रामीणों द्वारा हमसे पूछा जा रहा है वास्तविकता क्या है? सवाल यह भी है कि क्या संबंधित क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों द्वारा ग्रामीणों में किसी भी प्रकार से एऐसी सूचना दी गई जिससे वह इस लोक सुनवाई में सम्मिलित होने पर अपना पक्ष रख सके? ग्रामीणों में चर्चाएं हैं अभी कोई ओबी कंपनी क्षेत्र में दस्तक दे दे तो ऐसा प्रतीत होता है मानो इनसे अधिक हितैषी और कोई है नहीं धरना -प्रदर्शन से पत्राचार तक शुरू हो जाते हैं? फिर इस लोक सुनवाई को लेकर सामाजिक संगठनों से लेकर समाजसेवी तो तक कि चुप्पी कई तरह के ग्रामीणों में प्रश्न खड़े कर रहा है? कि कहीं ये किसी ओबी कंपनी आने या हितैषी संबंधित सुगबुगाहट तो नहीं? अब बात करते हैं लोक सुनवाई नियम क्या कहता है ? नियमानुसार सूचना कम से कम 30 दिन पूर्व देनी होती है? पर्चा में लिखा है कि पर्यावरणीय अधिसूचना दिनांक 14.9.2006, जिसे 2009 में संशोधित किया गया, उसके अनुसार किसी भी परियोजना की लोक सुनवाई से पहले प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को दो अखबारों एक हिंदी व अंग्रेजी में विज्ञापन के माध्यम से प्रसारित कराना होता है । सवाल यह है कि भले ही विज्ञापन के माध्यम से यह जानकारी प्रसारित हुई हो किंतु सवाल यह है भी है कि क्या सभी ग्रामीण अखबार पढ़ते हैं अखबारों कि पहुंच सभी ग्रामीणों तक है क्या ?क्या सच में सभी ग्रामीणो को इस आशय कि सूचना प्राप्त हुई थी? क्या एक माह पूर्व गांव-गांव में मुनादी कराई गई थी? अगर नहीं तो लोक सुनवाई को क्यों नहीं एक माह के लिए स्थगित करना चाहिए? क्या नियमानुसार परियोजना की पूरी ईआईए रिपोर्ट, सारांश और अभिलेख जिलाधिकारी कार्यालय, जिला पंचायत, जिला उद्योग केंद्र, पर्यावरण मंत्रालय लखनऊ और क्षेत्रीय कार्यालय रॉबर्ट्सगंज में 30 दिन पहले रखा होगा लेकिन सवाल यह है कि ग्रामीणों को इस रिपोर्ट के बारे में पता है क्या? क्या ग्रामीणों को यह अधिकार नहीं कि वह इस रिपोर्ट को पढ़कर अपनी आपत्ति तैयार कर सके ? जो पर्ची मंगलवार दोपहर ग्रामीणों में वितरित कि गई उस सूचना में लिखा जरूर है कि अभिलेख संबंधित कार्यालयों में रखे हैं, लेकिन सवाल यह है? कि गांव के ग्रामीणों से पूछो तो किसी ने वो रिपोर्ट देखी ही नहीं है। और न ही किसी को पढ़कर समझाया गया, और न हिंदी में किसी भी प्रकार का सारांश ग्रामीणों में क्यों वितरण नही किया गया है ? क्यों ग्रामीणों में सिर्फ एक पर्चा थमा दिया गया कि 28 अक्टूबर 2026 को एनसीएल खड़िया परियोजना आवासीय परिसर स्थित डीएवी पब्लिक स्कूल के मैदान में लोक सुनवाई होनी है? क्या नियमानुसार यह नहीं होता है कि लोक सुनवाई हेतु 30 दिन का समय इसलिए दिया जाता है कि उस क्षेत्र के लोगों जिनमें किसान, मजदूर, आदिवासी, महिलाएं सहित अन्य सभी व्यक्ति अपने कागजात,अपनी भूमि का रिकॉर्ड, अपनी आपत्ति,दावे या सुझाव लिखित रुप से तैयार कर प्रस्तुत कर सके? क्या सवाल यह नहीं है कि एक दिन में आम तौर पर कोई भी प्रभावित व्यक्ति अपने दावे,आपत्ति , सुझाव कैसे प्रस्तुत कर सकेगा? उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रीय कार्यालय सोनभद्र की आम सूचना के अनुसार मैसर्स नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड, खड़िया परियोजना तहसील दुद्धी, जनपद सोनभद्र के विस्तारीकरण हेतु प्रस्ताव आया है। क्षेत्रफल – 1640.0 हेक्टेयर से बढ़ाकर 1697.906 हेक्टेयर किया जा रहा है। यानि करीब 57.906 हेक्टेयर जमीन और बढ़ाई जा रही है।

उत्पादन क्षमता 15.0 मिलियन टन प्रतिवर्ष से बढ़ाकर 20.0 मिलियन टन प्रतिवर्ष की जा रही है। यानि 5 मिलियन टन सालाना कोयला और ज्यादा निकाला जाएगा। बैढन, खड़िया, चिल्काटांड़, परसवार राजा एवं भैरवा । ग्रामीणों कि चर्चाओ अनुसार वह पूछ रहे हैं कि अगर मेसर्स एनसीएल खड़िया परियोजना अपना उत्पादन 15 से 20 मिलियन टन करने हेतु 5 मिलियन टन कोयला हमारे अधिग्रहण वाली भूमि से निकलेगा या जहां से अभी निकल रहा है वहीं से निकलेगा। सवाल यह है कि खबरों के अनुसार भविष्य में एनसीएल कृष्णशिला परियोजना को भी एनसीएल खड़िया परियोजना में साथ कम्बाइंड करने की चर्चाएं हैं तो फिर इन सब गांवों के लिए लोक सुनवाई का क्या मतलब है? अगर उत्पादन कृष्ण शिला परियोजना से होना है तो चिल्काटाड, खड़िया , परसवार राजा, भैरवा के इन गांवों की भूमि क्यों बढ़ाई जा रही है? खबर के माध्यम से हम ग्रामीणों कि आवाज उठाने एवं उन्हें जागरूक करने के उद्देश्य से प्रकाशित कर रहे हैं। ग्रामीणों को पहले यह समझना चाहिए कि पर्यावरणीय स्वीकृति की सुनवाई का मतलब सीधे तौर पर जमीन अधिग्रहण नहीं होता, लेकिन क्षेत्रफल बढ़ने का मतलब यह है कि परियोजना का (दायरा बढ़ रहा)विस्तार हो रहा है। ग्रामीणों को पहले यह प्रश्न 57 हेक्टेयर अतिरिक्त जमीन किसकी है, किस खाते की है, उसमें कितनी निजी भूमि और कितनी वन भूमि है, कितनी भूमि सरकारी है, ईआईए रिपोर्ट में स्पष्ट लिखा होना चाहिए, जो ग्रामीणों को बताया ही नहीं गया। ग्रामीणों कि चर्चाओ अनुसार जब तक एनसीएल खड़िया परियोजना प्रबंधन स्पष्ट नहीं करती कि अतिरिक्त भूमि कहां है, किस गांव की है, उस भूमि पर कब्जा, स्वामित्व किसका है, तब तक के लिए लोक सुनवाई का कोई औचित्य ही नहीं है। ग्रामीणों अनुसार भले ही आपने अखबारों में विज्ञापन के जरिए खबर प्रकाशित कराई हो लेकिन सवाल यह है कि क्या सभी ग्रामीणों को अखबार के माध्यम से जानकारी प्राप्त हुई थी? क्या सभी ग्रामीणों को अखबार उपलब्ध कराया गया या फिर अखबार में प्रकाशित खबर को यह कैसे मान लिया जाए कि अखबार सभी ग्रामीण पढ़ते हैं ,और सभी को यह सूचना प्राप्त हुई होगी? ग्रामीणों अनुसार जो पर्ची मंगलवार 27 अक्टूबर को ग्राम पंचायतो में वाहनों एवं लाउडस्पीकर के माध्यम से वितरित किया गया उसे एक माह पूर्व नियमानुसार क्यों नहीं ग्रामीणों में प्रकाशित या प्रसारित किया गया? सवाल यह भी है कि ग्रामीणों को 30 दिन पूर्व इस तरह से सूचना क्यों नहीं मिली, ईआईए रिपोर्ट नहीं दी गई ? इसलिए क्यो न लोक सुनवाई 30 दिनों के लिए स्थगित किया जाना चाहिए? लोक सुनवाई संबंधित रिपोर्ट को हिंदी में संबंधित ग्राम के ग्राम पंचायत भवन में नोटिस चस्पा सहित वहां दस्तावेज रखें जाए और खड़िया एवं कृष्णशिला परियोजना को भविष्य में मिलाने की शंकाओं को लिखित में स्पष्ट किया जाए। ग्रामीणों कि चर्चाओ अनुसार 20 मिलियन टन कोयला किस खदान से निकलेगा, किस गांव की भूमि से निकलेगा, और किस गांव कि भूमि अधिग्रहण होगी, एनसीएल खड़िया परियोजना प्रबंधन एवं लोक सुनवाई में उपस्थित अधिकारियों और एनसीएल खड़िया परियोजना प्रबंधन के अधिकारियों को इन प्रश्नों के उत्तर लिखित तौर पर देना चाहिए। ग्रामीणों कि चर्चाओ अनुसार लोक सुनवाई में बिना इन प्रश्नों के उत्तर दिए ग्रामीण किसी भी तरह के लोक सुनवाई पर निर्णय लेने व शामिल होने को भी गलत मान रहे हैं। ग्रामीणों अनुसार अगर पर्यावरण स्वीकृति मिलने के बाद कंपनी ने कहा कि लोक सुनवाई में जनता ने सहमति दे दी थी, तो बाद में कैसे दावा, आपत्ति सुझाव को मान्य माना जाएगा। ग्रामीणों अनुसार हमारा क्षेत्र तो पहले से ही धूल, प्रदूषण, स्वच्छ पीने योग्य पेयजल उपलब्ध न होना, मूल भू विस्थापितों में बेरोजगारी, ब्लास्टिंग सड़क दूर्घटनाए , अन्य बिमारियों सहित अन्य मूलभूत सुविधाओ से जूझ रहा है, ऐसे में तीसरी बार विस्थापन का दंश मूल भू विस्थापित क्यों झेले। गांव कि महिला का एवं ग्रामीणों का कहना है कि हम तो पहले से ही एनसीएल खड़िया द्वारा जारी पर्ची अनुसार 15 मिलियन टन के प्रदूषण से क्या बिमारिया नहीं हो रही जो अब 20 मिलियन टन होगा तो क्या होगा? बिना स्वास्थ्य, पानी और रोजगार की गारंटी के विस्तार कैसे होगा? ग्रामीणों में चर्चाएं हैं कि 28 तारीख को लोक सुनवाई में अधिकारी क्या करते हैं? क्या वो गांव वालों की मांग पर सुनवाई टालते हैं? या क्या खानापूर्ति कर कागज पर हस्ताक्षर करवा लेते हैं? ग्रामीणों कि चर्चाओ अनुसार बीते वर्ष एनसीएल बीना परियोजना में हुए लोक सुनवाई को याद कर चर्चाएं कर रहे कि वहां के मूल भू विस्थापित आज भी बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं।

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