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सोनभद्र बीना बस स्टैंड में कथित खड़े ट्रक का हैंडब्रेक छुटा घर के सामने खडा ठेला व बाइक क्षतिग्रस्त


यूपी -सोनभद्र

दिनांक -17/10/2026

रिपोर्ट -सतीश दुबे -शत्रुघ्न कुमार

 

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कथित अतिक्रमण कर बनें घर-दुकान-गैरेजो कि खाता-खतौनी और पट्टे की जांच हो

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सोनभद्र। सोनभद्र में बीना चौकी अंतर्गत शुक्रवार सुबह करीब 7 से 8 बजे के करीब एक सडक किनारे खड़े एक ट्रेलर संख्या RJ ,20, GB 7219 , का कथित हैंडब्रेक छूटने से वह मुख्य मार्ग किनारे बने घर के पास खड़े ठेले व बाइक से भिड़ गया लोगों का कहना है वाहन का पहिया नाली में फसने से वह रुक गया नहीं तो घर में घुस जाता और बड़ा हादसा हो सकता था। चालक कैलाश ने बताया वाहन सिंगरौली कि है, जिसके मालिक रोहित है वह एनसीएल बीना परियोजना कोयला लोड कराने आया था वाहन खड़ा कर दूकान पर सामान लेने गया था इस दौरान अचानक हैंड ब्रेक छुट गया और गाड़ी ठेले व बाइक को क्षतिग्रस्त कर दिया। लोगों व चालक अनुसार उसका कहना है कि करीब एक घंटे से वाहन सड़क किनारे खड़ा था। लेकिन बड़ा सवाल अब यह है कि राष्ट्रीय राजमार्ग किनारे बसें इस घरों कि आखिर हकीकत क्या है इस हादसे ने उन पहलुओं को एक बार फिर खोल दिया दिया जो वर्षों से मुद्दे का विषय बना हुआ है। इस हादसे ने उस अव्यवस्था की पोल खोल दी है जो सालों से राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पनप रही है। बीना स्टैंड पर राजमार्ग पर खड़ा ट्रेलर कथित हैंड ब्रेक फेल होने या छुटने से अचानक लुढ़का और सुग्रीम शाह व राम धनी के घर के आगे खड़ा ठेला व बाइक से जा भिड़ा ठेला टूट गया और होंडा शाइन बाइक क्षतिग्रस्त हो गई। घर के लोग अंदर थे इसलिए वह सुरक्षित बच गए। लोगों का कहना है कि नाली में पहिया फंसने से ट्रेलर रुका नहीं तो घर के अंदर तक चला जाता। अब सवाल यह है कि जब घर ही राष्ट्रीय राजमार्ग की सरकारी जमीन से सटाकर अतिक्रमण करके बनाया गया है तो हादसा होने पर नुकसान तो होगा ही। नियम क्या कहता है कि नियमानुसार सड़क किनारे घर होना ही नहीं चाहिए था। लोगों में चर्चाएं हैं, कि जिला प्रशासन को अब सिर्फ हादसे की जांच नहीं करानी चाहिए बल्कि शक्तिनगर से लेकर औडी मोड़ डिबुलगंज तक पूरे राजमार्ग किनारे बने घरों, दुकानों और गैराजों की एक-एक करके जांच करानी चाहिए, जिसका भी घर-दुकान सड़क किनारे बना है उसका खाता, खतौनी, खसरा नंबर, प्लाट का पट्टा और जमीन का कागज देखा जाए कि जमीन उसकी निजी है या सरकारी भूमि पर कब्जा करके बनाई गई है। जो भी अवैध पाया जाए उस पर नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। अगर सड़क किनारे इस तरह अतिक्रमण करके घर-दुकान और गैराज न बने होते तो कोल व राख परिवहन के वाहन भी सड़क और पटरियों पर खड़े नहीं होते। अक्सर देखा जाता है कि राख व कोयला परिवहन करने वाले ट्रेलर-ट्रक इन्हीं गैराजों और दुकानों के चक्कर में सड़क व पटरियों पर दिन व रात में भी वाहन खड़ा कर देते हैं और फिर कभी मवेशी,कभी , कुत्ते,बकरी या व्यक्ति वाहन अचानक सामने आ जाने से सड़क दूर्घटनाए तथा हैंडब्रेक छूटने जैसी घटनाएं होती हैं। क्या कहता है,नियम,नियमानुसार इस तरह के अतिक्रमण पर कार्रवाई के लिए स्पष्ट तौर पर कानून हैं जैसे – राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम 1956 की धारा 26 के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग की भूमि पर अतिक्रमण करना दंडनीय अपराध है ,और इस पर अतिक्रमण हटाने का अधिकार राजमार्ग प्रशासन को एवं राष्ट्रीय राजमार्ग भूमि और यातायात नियंत्रण अधिनियम 2002 की धारा 23, 24 व 26 में स्पष्ट लिखा है, कि राजमार्ग की भूमि पर बिना अनुमति कोई निर्माण, दुकान, होर्डिंग या वाहन खड़ा नहीं किया जा सकता, अगर किया गया तो उसे हटाकर जुर्माना और मुकदमा दर्ज किया जाएगा। इसके अलावा उत्तर प्रदेश सड़क के किनारे की भूमि नियंत्रण अधिनियम 1945 के तहत भी सड़क से निर्धारित दूरी छोड़कर ही निर्माण करना अनिवार्य है, सड़क के मध्य बिंदु से तकरीबन 15 से 30 मीटर तक कोई पक्का निर्माण नहीं होना चाहिए। इसके अलावा भारतीय न्याय संहिता 2023 की धारा 283 के तहत सार्वजनिक मार्ग पर बाधा पहुंचाना, धारा 326 के तहत सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना और सार्वजनिक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम 1984 के तहत भी कार्रवाई का प्रावधान है। इसके अलावा नगर पालिका अधिनियम की धारा 296 व 298 के तहत बिना नक्शा पास कराए किए गए अतिक्रमण को हटाया जा सकता है। क्या सवाल उन परियोजनाओं और विभागों पर भी नहीं उठना चाहिए?जिनकी जवाबदेही बनती है। क्या पीडब्ल्यूडी विभाग, स्थानीय प्रशासन और एनसीएल बीना परियोजना के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की भी जांच नहीं होनी चाहिए? क्यों आखिर सरकारी भूमि पर लगातार अतिक्रमण हो रहा है? कैसे हो रहा है, ? कौन जिम्मेदार है? लोगों का आरोप है कि एनसीएल बीना परियोजना के अधिकारी केवल नोटिस-नोटिस का खेल खेलते हैं, जबकि बड़े-बड़े अतिक्रमणकारियों और गैराज वालों पर कार्रवाई नहीं होती, सिर्फ छोटे-मोटे ठेले और गुमटी वालों को हटवाकर वाहवाही लूटी जाती है, एनसीएल बीना परियोजना मुख्य महाप्रबंधक कार्यालय के समीप कई खटाले ( पशुपालन कर दुध बेचने वाले वर्षों से अतिक्रमण) सहित छोटी-छोटी पान,चाय, सिगरेट,गुटखा बेचने वाले कब्जा जमाए हुए हैं और कुछ तो धीरे-धीरे पक्का निर्माण ईंट सीमेंट लगाकर धीरे-धीरे कर रहे हैं, यही आगे चलकर पक्के निर्माण में बदल जाएगा फिर एनसीएल के जिम्मेदार कहेंगे हमें जानकारी नहीं थी। जबकि एनसीएल बीना महाप्रबंधक से लेकर अन्य जिम्मेदारो का प्रतिदिन कार्यालय आना-जाना इसी मार्ग से लगा रहता है, इसके साथ ही स्थानीय प्रशासन व जिम्मेदार विभाग के अधिकारियों का भी तो दौरा कभी न कभी लगता ही होगा तो फिर सब-कुछ जानते हुए अंजान क्यों? अब सवाल जब कब्जे का रुप छोटा हो तभी कार्रवाई सुनिश्चित क्यों नहीं कि जाती? और कार्रवाई बड़ी मछलियों पर होनी चाहिए, जिन्होंने पक्के मकान, दुकान और गैराज बना लिए हैं। स्थानीय लोगों अनुसार क्यों नही जिला प्रशासन इस ओर ध्यान देकर मामले की उच्चस्तरीय जांच करता? क्यों न राजस्व टीम से खसरा-खतौनी की जांच कराई जाए, क्यों पीडब्ल्यूडी से सड़क की नाप कराई जाए और जो भी अवैध पाया जाए उसे ध्वस्त करके सरकारी भूमि खाली कराई जाए और वाहन चालकों, वाहन स्वामियों परियोजनाओं के जिम्मेदार अधिकारियों पर भी नियमानुसार मुकदमा दर्ज किया जाए? अगर ऐसा नहीं किया गया तो आने वाले समय में जो हादसा आज हुआ किसी न किसी की जान लेकर ही जाएगा।

बाइट ( कैलाश, ट्रेलर चालक)

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